तनुजा मुखर्जी: बॉलीवुड की जादुई अदाकारा की अनकही कहानियाँ
तनुजा का अद्वितीय सफर
मुंबई, 22 सितंबर। तनुजा मुखर्जी, जिन्हें हिंदी सिनेमा में केवल तनुजा के नाम से जाना जाता है, ने अपनी आकर्षक मुस्कान और जीवंत अभिनय से दर्शकों को कई दशकों से मंत्रमुग्ध किया है।
23 सितंबर 1943 को मुंबई में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में जन्मी तनुजा ने साहसी भूमिकाओं के माध्यम से बॉलीवुड को एक नई दिशा दी। उनकी हंसी और गहरी आंखें, जो कहानियों को बयां करती हैं, आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसी हुई हैं।
तनुजा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो भारतीय सिनेमा का प्रतीक था। उनकी मां शोभना समर्थ और बड़ी बहन नूतन, दोनों ही अपने समय की प्रमुख अभिनेत्रियां थीं। दादी रतन बाई और मौसी नलिनी जयवंत भी सिनेमा की दुनिया में प्रसिद्ध नाम थीं। इस माहौल में, तनुजा का फिल्मों की ओर झुकाव स्वाभाविक था, लेकिन उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। बचपन से ही विद्रोही स्वभाव और स्वतंत्र सोच की धनी तनुजा ने अपने लिए खुद की राह चुनी।
सात साल की उम्र में, तनुजा ने 1950 में 'हमारी बेटी' में बाल कलाकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन उनकी असली पहचान 1960 में मां शोभना समर्थ के निर्देशन में बनी 'छबीली' से हुई। इसके बाद 'ज्वेल थीफ' में देव आनंद के साथ उनकी जोड़ी ने धूम मचाई। उनकी सहजता और स्क्रीन प्रजेंस ने उन्हें 60 और 70 के दशक की सबसे प्रिय अभिनेत्रियों में से एक बना दिया। चाहे 'दोस्त' में राजेश खन्ना के साथ उनकी रोमांटिक केमिस्ट्री हो या 'पवित्र पापी' (1970) में उनकी भावनात्मक गहराई, तनुजा ने हर किरदार को जीवंतता से निभाया।
तनुजा और देव आनंद की दोस्ती बहुत गहरी थी। वह उनकी खुलकर आलोचना करती थीं। उनकी दोस्ती का एक प्रसिद्ध किस्सा है, जो उनकी गहरी मित्रता और तनुजा के विद्रोही व्यक्तित्व को दर्शाता है। इस बारे में तनुजा ने एक इंटरव्यू में बताया।
यह किस्सा निर्देशक विजय आनंद की प्रसिद्ध फिल्म 'गाइड' की शूटिंग के दौरान का है। देव आनंद अपनी बहन की तबियत को लेकर चिंतित थे। उनकी चिंता इतनी गहरी थी कि वह शूटिंग के दौरान भी खोए-खोए रहते थे। सभी उनकी परेशानी को समझते थे, लेकिन कोई उनसे सीधे बात करने की हिम्मत नहीं करता था।
तनुजा ने उन्हें परेशान देखा और बिना किसी झिझक के उनके पास गईं। जहां अन्य लोग सम्मान से बात करते थे, वहीं तनुजा ने अपने दोस्त से एक अलग अंदाज में बात की।
तनुजा ने देव आनंद से कहा, "आप सिर्फ अपनी बहन के बारे में क्यों सोचते हैं? अपनी जिंदगी जिएं और खुश रहें।"
देव आनंद, जो अपनी बहन को लेकर चिंतित थे, तनुजा के इस अंदाज से चकित रह गए। वह एक पल के लिए चुप रहे और फिर उन्होंने तनुजा को गले लगा लिया। उन्होंने कहा, "तुम अद्भुत हो।"
इस डांट में उन्हें एक सच्चे दोस्त का प्यार और परवाह दिखाई दी। तनुजा ने बताया कि देव आनंद उनके लिए ऐसे दोस्त थे जिनसे वह बिना किसी संकोच के बात कर सकती थीं। यह किस्सा उनकी सहजता और बिंदास व्यक्तित्व को दर्शाता है।