जी.पी. सिप्पी: बॉलीवुड के अमर निर्माता की अनकही कहानी
जी.पी. सिप्पी का जीवन और करियर
मुंबई, 13 सितंबर। हिंदी सिनेमा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिन्हें किसी एक फिल्म से नहीं जोड़ा जा सकता। जी.पी. सिप्पी भी ऐसे ही एक नाम हैं। उन्होंने अपने लंबे करियर में कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें से एक फिल्म आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार मानी जाती है। जी.पी. सिप्पी की कहानी केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है; इसमें संघर्ष, व्यापार, विभाजन का दर्द और नए सिरे से शुरुआत करने की प्रेरणा भी शामिल है।
दिलचस्प बात यह है कि 'सिप्पी' नाम, जिसके लिए वह फिल्म इंडस्ट्री में प्रसिद्ध हुए, वास्तव में उनके परिवार का असली सरनेम नहीं था। उनका असली नाम गोपालदास परमानंद सिपाहिमलानी था, और 'सिप्पी' नाम बाद में उनकी पहचान बन गया।
जी.पी. सिप्पी का जन्म 14 सितंबर 1914 को हैदराबाद, सिंध में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था और अब पाकिस्तान में है। वह एक समृद्ध कारोबारी परिवार से थे, जिनका व्यापार अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय लोगों के साथ था। 'सिपाहिमलानी' नाम बोलने में कठिनाई के कारण लोग उन्हें 'सिप्पी' कहने लगे, और यही नाम उनके साथ जुड़ गया।
फिल्मों में कदम रखने से पहले, जी.पी. सिप्पी का जीवन पूरी तरह से अलग था। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और वकील के रूप में काम किया। उनका जीवन कराची में भी बीता, जहां वह व्यापार में सक्रिय रहे। लेकिन 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन ने उनकी जिंदगी को बदल दिया। सिप्पी परिवार को सिंध छोड़कर भारत आना पड़ा। मुंबई पहुंचने के बाद, उन्होंने फिर से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश की और प्रॉपर्टी और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में कदम रखा।
यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा शुरू हुई। मुंबई के मरीन लाइंस में गोविंद महल के निर्माण के दौरान, उन्होंने निर्माण अधिकार बेचकर जो धन अर्जित किया, उसका उपयोग अपनी पहली फिल्म बनाने में किया। इस तरह, एक वकील और कारोबारी के रूप में काम कर चुके जी.पी. सिप्पी ने 1951 में फिल्म 'सजा' के साथ हिंदी सिनेमा में कदम रखा। फिल्म में देव आनंद और निम्मी मुख्य भूमिकाओं में थे। हालांकि फिल्म को बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन इसके बाद उनका फिल्मी सफर शुरू हो गया।
इसके बाद, जी.पी. सिप्पी ने कई फिल्मों का निर्माण किया और कुछ का निर्देशन भी किया। 1950 के दशक में, उन्होंने 'शाहेंशाह', 'भाई-बहन', '12 ओ'क्लॉक' और 'मरीन ड्राइव' जैसी फिल्मों में काम किया। वह केवल निर्माता नहीं थे, बल्कि 'मरीन ड्राइव', 'अदल-ए-जहांगीर', 'श्रीमती 420', 'लाइट हाउस' और 'मिस्टर इंडिया' जैसी फिल्मों के निर्देशक भी रहे। हालांकि, 1960 के दशक के बाद उनका ध्यान मुख्य रूप से फिल्म निर्माण पर केंद्रित हो गया।
जी.पी. सिप्पी की फिल्मों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता गया। उन्होंने 'ब्रह्मचारी', 'अंदाज', 'सीता और गीता' और 'शान' जैसी चर्चित फिल्मों का निर्माण किया। 1972 में आई 'सीता और गीता' ने उनकी पहचान को और मजबूत किया। लेकिन उनके करियर की सबसे बड़ी फिल्म अभी बाकी थी। 1975 में उनके बेटे रमेश सिप्पी के निर्देशन में 'शोले' रिलीज हुई, जिसने जी.पी. सिप्पी का नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया। इस फिल्म का निर्माण जी.पी. सिप्पी और उनके बेटे रमेश सिप्पी ने मिलकर किया।
'शोले' के बाद भी जी.पी. सिप्पी का फिल्मी सफर जारी रहा। उन्होंने 'शान', 'सागर', 'राजू बन गया जेंटलमैन', 'पत्थर के फूल', 'जमाना दीवाना' और 'हमेशा' जैसी फिल्मों का निर्माण किया। उनके बेटे रमेश सिप्पी भी बाद में एक प्रमुख फिल्म निर्देशक बने, जिससे सिप्पी परिवार की फिल्मी विरासत आगे बढ़ी।
फिल्मों के अलावा, जी.पी. सिप्पी फिल्म इंडस्ट्री के कामकाज में भी सक्रिय रहे। वह फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और फिल्म एंड टीवी प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे। उन्हें उनके फिल्मी योगदान के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला, जिसमें 1968 और 1982 में उन्हें सम्मानित किया गया।
जी.पी. सिप्पी का निधन 25 दिसंबर 2007 को 93 वर्ष की आयु में हुआ।