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जितेंद्र की पहली फिल्म: ऊंट पर कूदकर मिली पहचान, लेकिन तनख्वाह में हुई कटौती!

जितेंद्र का फिल्मी सफर संघर्ष और मेहनत से भरा रहा है। उन्होंने ऊंट पर कूदकर अपनी पहली फिल्म पाई, लेकिन इस दौरान उनकी तनख्वाह में कटौती हुई। जानें कैसे उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की और वी. शांताराम के साथ अपने अनुभव साझा किए। यह कहानी आपको प्रेरित करेगी कि कैसे एक अभिनेता ने अपने सपनों को साकार किया।
 

जितेंद्र का सिनेमा सफर




मुंबई, 6 अप्रैल। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए हर नए अभिनेता को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। पहली फिल्म मिलना किसी के लिए भी एक बड़ा अवसर होता है, लेकिन जितेंद्र के लिए यह एक नुकसानदायक सौदा साबित हुआ।


जितेंद्र ने 150 रुपए की तनख्वाह से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी। उन्हें कभी नहीं लगा था कि वे फिल्मों में काम करेंगे, लेकिन पैसे कमाने और नाम कमाने की चाह ने उन्हें बॉडी डबल के रूप में हिंदी सिनेमा में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। क्या आप जानते हैं कि जितेंद्र ने पहली बार मुख्य अभिनेता के रूप में फिल्म पाने के लिए कितनी मेहनत की थी?


जितेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 को हुआ। उनके पिता नकली ज्वेलरी की दुकान चलाते थे और फिल्म सेट पर भी अपने गहने बेचते थे। जितेंद्र ने अपने पिता के काम में मदद की और फिल्मों के प्रति उनका लगाव बचपन से ही था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि यही काम उन्हें हिंदी सिनेमा में लाएगा। उनकी पहली फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' थी, लेकिन इससे पहले उन्होंने फिल्म 'सेहरा' पर काम किया था। इसी फिल्म में उनकी मेहनत और लगन को देखकर निर्देशक वी. शांताराम ने उन्हें पहली बार मुख्य अभिनेता का रोल ऑफर किया।


बहुत से लोग नहीं जानते कि जितेंद्र ने 'सेहरा' के सेट पर हर तरह का काम किया। उन्होंने आर्टिस्टों की जरूरतों का ध्यान रखा और उस समय उनकी मासिक तनख्वाह 150 रुपए थी। इस फिल्म के दौरान, उन्होंने वी. शांताराम को प्रभावित करने के लिए हर संभव प्रयास किए। खुद जितेंद्र ने स्वीकार किया कि उन्होंने निर्देशक को खुश करने के लिए चापलूसी की सभी सीमाएं पार कर दी थीं।


एक बार फिल्म में अभिनेत्री संध्या को ऊंट पर कूदने का सीन करना था। निर्देशक ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो यह सीन कर सके और संध्या के जैसा दिखे। जितेंद्र ने इस चुनौती को स्वीकार किया और ऊंट पर कूद गए। यह सीन केवल पैसे के लिए नहीं, बल्कि खुद को साबित करने के लिए किया गया था। इसके बाद उन्हें फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' में लीड रोल मिला, जिसमें उनकी तनख्वाह 100 रुपए थी।


जितेंद्र ने बताया कि उस समय पैसे की कोई अहमियत नहीं थी, क्योंकि वी. शांताराम ने ही उन्हें सिनेमा में कदम रखने का मौका दिया था।