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जयकिशन: संगीत की दुनिया में अमर धरोहर, 55 साल बाद भी गूंजते हैं उनके गाने

जयकिशन, हिंदी सिनेमा के एक अमर संगीतकार, जिनका निधन 55 साल पहले हुआ, आज भी अपने संगीत के लिए याद किए जाते हैं। उनके प्रसिद्ध गाने जैसे 'प्यार हुआ इकरार हुआ' और 'मेरा जूता है जापानी' आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं। जानें उनके जीवन की कहानी, संघर्ष और उनके साथियों के साथ मिलकर बनाए गए संगीत की यात्रा के बारे में।
 

जयकिशन का संगीत: एक अमिट छाप




मुंबई, 11 सितंबर। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो एक युग की पहचान बन जाते हैं। जयकिशन का नाम भी इन्हीं में शामिल है। 12 सितंबर 1971 को केवल 41 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन आज भी उनके संगीत की गूंज सुनाई देती है।


उनकी मृत्यु को 55 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन जब भी 'प्यार हुआ इकरार हुआ', 'मेरा जूता है जापानी', 'आवारा हूं', 'ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर' या 'जिंदगी एक सफर है सुहाना' जैसे गाने सुनाई देते हैं, तो एक सुनहरे युग की याद ताजा हो जाती है। जयकिशन ने अपने साथी शंकर के साथ मिलकर ऐसा संगीत तैयार किया, जो समय के साथ भी पुराना नहीं हुआ।


जयकिशन दयाभाई पंचाल का जन्म 4 नवंबर 1929 को गुजरात के बांसदा में हुआ। संगीत के प्रति उनका लगाव बचपन से था और उन्होंने इसकी औपचारिक शिक्षा भी ली। हारमोनियम पर उनकी महारत ने उन्हें मुंबई की ओर खींचा, लेकिन फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। संघर्ष के दिनों में उन्होंने एक फैक्ट्री में भी काम किया और साथ ही फिल्मों में संगीत के अवसरों की तलाश करते रहे।


उनकी जिंदगी का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात शंकर से हुई। यह मुलाकात गुजराती निर्देशक चंद्रवदन भट्ट के ऑफिस के बाहर हुई और धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई। शंकर ने जयकिशन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पृथ्वी थिएटर में हारमोनियम बजाने का अवसर दिया। यहां दोनों ने मिलकर काम किया। पृथ्वी थिएटर में ही राज कपूर की नजर इस प्रतिभाशाली जोड़ी पर पड़ी। पहले दोनों ने फिल्म 'आग' में संगीतकार राम गांगुली के सहायक के रूप में काम किया और फिर 1949 में आई 'बरसात' ने उनकी किस्मत बदल दी।


'बरसात' के संगीत की सफलता के बाद शंकर-जयकिशन हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े नामों में शामिल हो गए। इसके बाद 'आवारा', 'श्री 420', 'चोरी चोरी', 'अनाड़ी', 'बसंत बहार', 'जंगली', 'संगम', 'सूरज', 'ब्रह्मचारी', 'मेरा नाम जोकर' और 'अंदाज' जैसी फिल्मों में उनकी धुनों ने दर्शकों का दिल जीत लिया।


राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई ऐसे गाने दिए, जो आज भी भारतीय संगीत की पहचान माने जाते हैं। 'मेरा जूता है जापानी' को विश्व के कई हिस्सों में सराहा गया। वहीं, बारिश में फिल्माया गया 'प्यार हुआ इकरार हुआ' आज भी हिंदी फिल्मों के सबसे प्रसिद्ध रोमांटिक गानों में गिना जाता है। 'आवारा हूं' और 'जीना यहां मरना यहां' जैसे गाने भी विभिन्न पीढ़ियों के दिलों में बसे हुए हैं।


शंकर-जयकिशन की जोड़ी की विशेषता यह थी कि वे कई बार अलग-अलग धुनें तैयार करते थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताते थे कि कौन-सी धुन किसने बनाई है। यही कारण है कि उनके संगीत की असली ताकत हमेशा 'शंकर-जयकिशन' के नाम से पहचानी गई।


इस जोड़ी ने सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए नौ फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। उस समय उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि बड़े बैनर और सितारे उनके संगीत के साथ जुड़ना चाहते थे। 'चोरी चोरी', 'अनाड़ी', 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'प्रोफेसर', 'सूरज', 'ब्रह्मचारी', 'पहचान' और 'मेरा नाम जोकर' जैसी फिल्मों के संगीत ने उनकी प्रसिद्धि को और बढ़ाया।


12 सितंबर 1971 को जयकिशन का निधन लिवर सिरोसिस के कारण हुआ। उनके जाने के बाद भी शंकर ने संगीत देना जारी रखा और कई फिल्मों में संगीतकार का नाम शंकर-जयकिशन ही रखा गया।