गोविंद नामदेव: बॉलीवुड के मोस्ट वांटेड विलेन की अनकही कहानी
गोविंद नामदेव का अद्वितीय सफर
नई दिल्ली, 2 सितंबर। हिंदी सिनेमा में अपने अद्भुत अभिनय और गहरी आवाज के लिए मशहूर गोविंद नामदेव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। 3 सितंबर 1950 को मध्य प्रदेश के सागर में जन्मे इस अभिनेता ने अपने 30 साल से अधिक के करियर में 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। उनका असली स्थान एक ऐसे कलाकार के रूप में है जिसने कभी हीरो बनने का ख्वाब नहीं देखा, बल्कि अपने किरदारों को हीरो बना दिया।
साधारण पृष्ठभूमि से अभिनय की ओर
गोविंद का बचपन एक साधारण परिवार में बीता। उनके पिता चाहते थे कि वह पढ़ाई करके एक नौकरी करें, लेकिन गोविंद का मन अभिनय में था। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला लिया और 1977 में वहां से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। एनएसडी के बाद उन्होंने लगभग 12-15 साल तक थिएटर में काम किया। दिल्ली के मंच पर उन्होंने कई प्रमुख नाटकों में भाग लिया। इस दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध निर्देशकों केतन मेहता और डेविड धवन से हुई, लेकिन फिल्मों में कदम रखना आसान नहीं था।
फिल्मों में कदम और पहचान
कहा जाता है कि गोविंद ने 40 साल की उम्र तक फिल्मों के बारे में नहीं सोचा था। वह थिएटर में संतुष्ट थे। उन्हें 1992 में डेविड धवन की फिल्म 'शोला और शबनम' में पहला बड़ा मौका मिला, जब उनकी उम्र 42 वर्ष थी। इस फिल्म में उनके किरदार को सराहा गया। लेकिन असली पहचान 1994 में आई फिल्म 'बैंडिट क्वीन' से मिली, जिसमें उन्होंने ठाकुर का किरदार निभाया। उनकी क्रूरता ने दर्शकों को प्रभावित किया।
विलेन के रूप में सफलता
इसके बाद गोविंद के लिए विलेन के रोल की भरमार हो गई। 'विरासत' (1997), 'सत्या' (1998), 'सरफरोश', 'पुकार', 'लज्जा', और 'कसम' जैसी फिल्मों में उन्होंने बेहतरीन निगेटिव किरदार निभाए। 'सरफरोश' में सुल्तान के रोल के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। आमिर खान के सामने उनकी आंखों से डर पैदा करने वाली अदाकारी ने उन्हें बॉलीवुड का मोस्ट वांटेड विलेन बना दिया।
अभिनय की परिभाषा
एक इंटरव्यू में गोविंद ने कहा था कि वह कभी हीरो बनने नहीं आए थे, बल्कि एक अभिनेता बनना चाहते थे। उनका मानना है कि कोई किरदार बड़ा या छोटा नहीं होता, बल्कि उसकी गहराई मायने रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कभी लीड रोल की चाह नहीं की। 'सत्या' में भाऊ और 'विरासत' में अपने दमदार अभिनय के लिए उन्हें कई पुरस्कार और नामांकनों से नवाजा गया। 1999 में फिल्म 'समर' के लिए उन्हें बेस्ट विलेन का स्क्रीन अवार्ड भी मिला।
70 की उम्र में भी सक्रिय
70 साल की उम्र में भी गोविंद नामदेव सक्रिय हैं। वह फिल्मों के साथ-साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं। 'अभय', 'द कश्मीर फाइल्स' और कई वेब सीरीज में उनके काम को सराहा गया है। सागर के एक छोटे से शहर से निकलकर एनएसडी और फिर मुंबई तक का उनका सफर आज के युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा है। वह इस बात के जीवित उदाहरण हैं कि अगर प्रतिभा है, तो उम्र केवल एक संख्या है।