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गोवर्धन कुमार असरानी: हिंदी सिनेमा के अनमोल हास्य कलाकार की कहानी

गोवर्धन कुमार असरानी, जिन्हें हिंदी सिनेमा में उनकी अद्भुत कॉमिक टाइमिंग और यादगार किरदारों के लिए जाना जाता है, का सफर दर्शकों के दिलों में एक खास स्थान रखता है। उनका सबसे प्रसिद्ध किरदार फिल्म 'शोले' में जेलर का था, जो आज भी लोगों को हंसाता है। जानें उनके जीवन, करियर और उन किरदारों के बारे में जिन्होंने उन्हें एक अद्वितीय हास्य कलाकार बना दिया।
 

गोवर्धन कुमार असरानी का अद्वितीय सफर


नई दिल्ली, 20 अक्टूबर (वेब वार्ता)। हिंदी फिल्म उद्योग में कई ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिलों में एक खास स्थान बनाया है। इनमें गोवर्धन कुमार असरानी का नाम भी शामिल है, जिन्हें लोग असरानी के नाम से जानते हैं। उनकी अद्भुत कॉमिक टाइमिंग, चेहरे के अनोखे हाव-भाव और मजेदार संवाद बोलने की शैली ने दर्शकों को खूब हंसाया है।


असरानी ने अपने करियर में विभिन्न प्रकार के किरदार निभाए, लेकिन फिल्म ‘शोले’ में अंग्रेजों के जमाने के जेलर के रूप में उनकी पहचान इतनी गहरी बनी कि आज भी जब उनका नाम लिया जाता है, तो यह किरदार याद आ जाता है। 20 अक्टूबर 2025 को 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन वह आज भी दर्शकों की यादों में जीवित हैं।


असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को राजस्थान के जयपुर में एक सिंधी-हिंदू परिवार में हुआ। उनके पिता कालीन और साड़ियों का व्यापार करते थे। परिवार चाहता था कि वह पढ़ाई पूरी करके व्यापार में हाथ बटाएं, लेकिन असरानी का झुकाव अभिनय और संगीत की ओर था। वह आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे और स्कूल के दिनों से ही नाटकों में भाग लेते थे। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया, जिससे उनके अभिनय के प्रति रुचि बढ़ी।


मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अभिनेता बनने का सपना देखना शुरू किया। इस सपने को पूरा करने के लिए वह मुंबई आए, लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें सही दिशा नहीं मिली और वह वापस जयपुर लौट गए। फिर भी, उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा। कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में दाखिला लिया और अभिनय की बारीकियों को सीखा।


असरानी के लिए फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। अभिनय की पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह हर शुक्रवार पुणे से मुंबई जाते, फिल्म निर्माताओं से मिलते और काम की उम्मीद लेकर लौटते।


शुरुआत में उन्हें छोटे-छोटे किरदार मिले, लेकिन उन्होंने हर भूमिका को मेहनत और ईमानदारी से निभाया। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा लोगों की नजरों में आने लगी। ‘गुड्डी’, ‘बावर्ची’, ‘नमक हराम’, ‘अभिमान’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी अदाकारी से अलग पहचान बनाई। इन फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि किसी किरदार को यादगार बनाने के लिए उसका बड़ा होना जरूरी नहीं, बल्कि उसे निभाने का अंदाज मायने रखता है।


फिल्म ‘आज की ताजा खबर’ में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। इसके अलावा, ‘रफूचक्कर’, ‘बालिका वधू’ और ‘पति पत्नी और वो’ जैसी फिल्मों में भी उनकी कॉमेडी दर्शकों को बहुत पसंद आई।


असरानी के करियर का सबसे यादगार किरदार 1975 में आई फिल्म ‘शोले’ का जेलर था। फिल्म में उनका प्रसिद्ध डायलॉग, ‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’, आज भी लोगों की जुबान पर है। इस किरदार में वह खुद को चालाक और ताकतवर समझने वाले जेलर के रूप में पेश हुए, लेकिन उनकी हरकतें दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती थीं।


हालांकि फिल्म में उनका किरदार छोटा था, लेकिन उन्होंने अपनी अदाकारी से ऐसी छाप छोड़ी कि वह हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित कॉमिक किरदारों में शामिल हो गए।