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गजल के बादशाह मेहदी हसन: संघर्ष से सफलता तक का सफर

मेहदी हसन, जिन्हें गजल के शहंशाह के रूप में जाना जाता है, ने अपने संघर्ष और मेहनत से संगीत की दुनिया में एक अद्वितीय स्थान बनाया। राजस्थान में जन्मे, उन्होंने अपने परिवार के लिए साइकिल की दुकान पर काम किया, लेकिन संगीत से कभी दूर नहीं हुए। विभाजन के बाद पाकिस्तान चले जाने के बावजूद, उन्होंने गजल गायकी में अपनी पहचान बनाई और कई यादगार गाने गाए। उनकी आवाज ने लाखों लोगों को प्रभावित किया और आज भी उनकी गजलें लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।
 

मेहदी हसन का अद्भुत सफर


मुंबई, 17 जुलाई। गजल के क्षेत्र में मेहदी हसन को शहंशाह माना जाता है। उनकी आवाज ने लाखों दिलों को छू लिया। कठिनाइयों का सामना करते हुए, उन्होंने अपने जुनून और मेहनत से सफलता की ऊंचाइयों को छुआ। एक समय था जब उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए साइकिल की दुकान पर काम करना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी भी संगीत से अपने संबंध को नहीं तोड़ा और अंततः गजल की दुनिया में एक बड़ा नाम बन गए।


मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले में हुआ। उनका परिवार संगीत में गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान जैसे बड़े कलाकार थे। बचपन से ही उन्हें संगीत का माहौल मिला और उन्होंने केवल 8 साल की उम्र में संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। जल्दी ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को समझ लिया। 18 साल की उम्र तक, वे ध्रुपद, ठुमरी और खयाल गायकी में माहिर हो चुके थे।


जब उनका करियर उभरने लगा, तब देश का विभाजन उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ लाया। 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद, मेहदी हसन अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। नए देश में शुरुआत करना आसान नहीं था। परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहा था, और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया था। ऐसे में, उन्होंने साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया, लेकिन संगीत के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।


दिन में काम करने के बाद, वे रात को रियाज करते थे, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। लगभग दस साल की मेहनत के बाद, 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का अवसर मिला। उन्होंने शुरुआत में ठुमरी गाकर पहचान बनाई, लेकिन जल्द ही गजल गायकी की ओर बढ़ गए। उनकी शास्त्रीय संगीत की समझ और गाने की अनोखी शैली ने उन्हें अन्य गायकों से अलग पहचान दिलाई। देखते ही देखते, मेहदी हसन गजल के क्षेत्र में एक प्रमुख नाम बन गए।


इसके बाद, उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मों के लिए भी कई यादगार गाने गाए। उनकी लोकप्रियता केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत और विश्वभर में उनके प्रशंसक बन गए। उनकी गाई हुई गजलें जैसे 'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'अब के हम बिछड़े तो शायद', 'दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है' और 'मोहब्बत करने वाले कम न होंगे' आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।


भारत के कई बड़े कलाकार भी मेहदी हसन की आवाज के मुरीद थे। महान गायिका लता मंगेशकर ने उनकी गायकी की तारीफ करते हुए कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन साहब के गले में भगवान बोलते हैं। जगजीत सिंह जैसे कई बड़े गायकों ने उन्हें प्रेरणा का स्रोत माना।


संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस, तमगा-ए-इम्तियाज, हिलाल-ए-इम्तियाज और निशान-ए-इम्तियाज जैसे पुरस्कारों से नवाजा। भारत में, उन्हें 1979 में केएल सहगल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिणा बाहु सम्मान दिया।


मेहदी हसन का निधन 13 जून 2012 को कराची में हुआ। बीमारी के कारण उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी आवाज आज भी जीवित है।