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गंगूबाई हंगल: भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनमोल धरोहर

गंगूबाई हंगल, भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक अद्वितीय हस्ती, ने अपने जीवन में कई संघर्षों का सामना किया। 5 मार्च को उनकी जयंती पर, जानें कैसे उन्होंने समाज की बाधाओं को तोड़ते हुए संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनकी गहरी आवाज और रागों के प्रति प्रेम ने उन्हें एक मिसाल बना दिया। इस लेख में उनके जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।
 

गंगूबाई हंगल का अद्वितीय सफर


नई दिल्ली, 4 मार्च। भारतीय शास्त्रीय संगीत की कई महान हस्तियों ने कठिनाइयों का सामना करते हुए अपनी पहचान बनाई है। इनमें से एक प्रमुख नाम है गंगूबाई हंगल, जिन्होंने उस समय में अपने संगीत के सफर की शुरुआत की जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना एक चुनौती थी।


गंगूबाई हंगल ने अपनी गहरी और प्रभावशाली आवाज से न केवल रागों को जीवंत किया, बल्कि समाज की कठोर सीमाओं को भी तोड़ा। उन्हें ‘गानेवाली’ कहकर ताने दिए गए, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और संगीत की दुनिया में अपनी अमिट छाप छोड़ी।


उनकी जयंती 5 मार्च को मनाई जाती है। गंगूबाई का जन्म 1913 में कर्नाटक के धारवाड़ में एक केवट परिवार में हुआ था। उनका बचपन गरीबी और सामाजिक भेदभाव से भरा था। उनकी मां अंबाबाई, जो खुद एक कर्नाटक संगीत की गायिका थीं, ने उन्हें संगीत की पहली शिक्षा दी। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने किराना घराने के उस्ताद सवाई गंधर्व से औपचारिक शिक्षा लेना शुरू किया।


उस समय समाज में महिलाओं का सार्वजनिक मंच पर गाना अस्वीकार्य था, विशेषकर निचली जाति से आने वाली एक लड़की के लिए। गंगूबाई ने इन तानों को अपने लिए चुनौती बना लिया। उनकी आत्मकथा ‘ए लाइफ इन थ्री ऑक्टेव्स: द म्यूजिकल जर्नी ऑफ गंगूबाई हंगल’ में उनके संघर्षों का विस्तृत वर्णन है।


गंगूबाई की गायकी की विशेषता उनकी गहरी और भावपूर्ण प्रस्तुति थी। वह रागों को धीरे-धीरे विस्तार देती थीं, जिससे श्रोता उनके संगीत में खो जाते थे। 1930 के दशक में मुंबई के स्थानीय कार्यक्रमों से शुरू होकर उनका सफर ऑल इंडिया रेडियो और देशभर के मंचों तक पहुंचा। उन्होंने शुरुआत में भजन और ठुमरी गाई, लेकिन बाद में पूरी तरह रागों पर ध्यान केंद्रित किया और किराना घराने की परंपरा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।


गंगूबाई के योगदान को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें 1962 में कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी पुरस्कार, 1971 में पद्म भूषण, 2002 में पद्म विभूषण, 1973 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1996 में फेलोशिप शामिल हैं। 1997 में दीनानाथ प्रतिष्ठान और 1998 में माणिक रतन पुरस्कार भी उन्हें मिले।


उनकी स्मृति में कर्नाटक सरकार ने 2008 में कर्नाटक स्टेट डॉ. गंगूबाई हंगल म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स यूनिवर्सिटी की स्थापना की। 2014 में भारत सरकार ने उनकी याद में डाक टिकट जारी किया।


गंगूबाई का निजी जीवन भी कई दुखों से भरा था। 16 साल की उम्र में शादी, 20 साल की उम्र में पति का निधन, और बेटी कृष्णा की कैंसर से मृत्यु ने उन्हें प्रभावित किया, लेकिन उन्होंने संगीत से कभी दूरी नहीं बनाई। 2006 में 75 साल के करियर का जश्न मनाते हुए उन्होंने अपनी अंतिम प्रस्तुति दी। 21 जुलाई 2009 को 97 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।