क्या जानते हैं आप जे. पी. दत्ता की प्रेरणादायक कहानी? जानें उनकी फिल्में और संघर्ष!
जे. पी. दत्ता: एक फिल्ममेकर की प्रेरणा
मुंबई, 2 अक्टूबर। जब भी हिंदी सिनेमा में युद्ध, सैनिकों और देश की सीमाओं पर तैनात जवानों की कहानियों का जिक्र होता है, जे. पी. दत्ता का नाम सबसे पहले आता है। उनकी प्रसिद्ध फिल्में जैसे 'बॉर्डर', 'एलओसी कारगिल' और 'पलटन' ने न केवल सैनिकों की वीरता को दर्शाया, बल्कि उनके परिवारों की भावनाओं को भी उजागर किया।
कम ही लोग जानते हैं कि 'बॉर्डर' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि जे. पी. दत्ता के जीवन और उनके परिवार के अनुभवों का परिणाम है। उन्होंने कई बार बताया है कि उनका फौज से जुड़ाव फिल्मों से पहले का है।
जे. पी. दत्ता का जन्म 3 अक्टूबर 1949 को मुंबई में हुआ। उनके पिता ओ. पी. दत्ता भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे। उनके परिवार का फौजी इतिहास उनकी फिल्मों को एक विशेष दिशा प्रदान करता है। उनके छोटे भाई दीपक दत्ता एयरफोर्स में थे और 1971 की लड़ाई में लोंगेवाला की लड़ाई में शामिल हुए थे।
एक इंटरव्यू में, जे. पी. दत्ता ने साझा किया कि जब उनके छोटे भाई 1971 की लड़ाई से लौटे, तब उन्होंने उस अनुभव को एक रफ बुक में लिखना शुरू किया। उस समय वह कॉलेज में थे, और उनकी मां रेडियो के पास बैठकर अपने बेटे की सलामती की खबर सुनने की कोशिश कर रही थीं। यह चिंता और इंतजार बाद में उनकी फिल्मी सोच का हिस्सा बन गया।
इसी व्यक्तिगत जुड़ाव के कारण उन्होंने 'बॉर्डर' बनाई, जो 1997 में रिलीज हुई और 1971 की लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। जे. पी. दत्ता ने बताया कि फिल्म में उस लड़ाई को यथार्थता के साथ दिखाने का प्रयास किया गया था। फिल्म की शूटिंग रेगिस्तान में हुई, जहां दिसंबर की ठंड में काम करना चुनौतीपूर्ण था।
फिल्म में लगभग 40 टैंक, 1,000 सैनिक और एक बड़ी यूनिट के साथ शूटिंग की गई थी। 'बॉर्डर' के सफल होने के बाद, जे. पी. दत्ता का नाम युद्ध फिल्मों के साथ मजबूती से जुड़ गया। इस फिल्म को 1997 के लिए राष्ट्रीय एकता पर सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का नरगिस दत्त पुरस्कार भी मिला।
दिलचस्प बात यह है कि 'बॉर्डर' के बाद, दत्ता ने कई वर्षों तक इसी शैली में काम किया। 'एलओसी कारगिल' में उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध की कहानी को बड़े सितारों के साथ पर्दे पर पेश किया। इसके बाद 'पलटन' में 1967 के नाथू ला संघर्ष की कहानी दिखाई। उन्होंने बताया कि इस घटना के बारे में बहुत कम लोग जानते थे, और आर्मी के दोस्तों से मिली जानकारी के आधार पर उन्होंने इस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया।
हालांकि, जे. पी. दत्ता ने अपने करियर में 'गुलामी', 'यतीम', 'बंटवारा', 'हथियार', 'क्षत्रिय', 'रिफ्यूजी' और 'उमराव जान' जैसी फिल्में भी बनाई हैं। 2006 में 'उमराव जान' के बाद, वह लंबे समय तक निर्देशन से दूर रहे, लेकिन 2018 में 'पलटन' के साथ उन्होंने वापसी की।