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क्या आप जानते हैं पी. जयराज की अनकही कहानी? भारतीय सिनेमा के इस दिग्गज का सफर!

पी. जयराज, भारतीय सिनेमा के एक महानायक, ने मूक फिल्मों से लेकर बोलती फिल्मों तक एक अद्वितीय सफर तय किया। उनके जीवन की कहानी में संघर्ष, सफलता और अदाकारी की अनगिनत कहानियाँ हैं। जानें कैसे उन्होंने अपने करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित हुए। इस लेख में उनके जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर एक नजर डालें।
 

भारतीय सिनेमा के महानायक पी. जयराज का सफर




नई दिल्ली, 10 अगस्त। यह कहानी है एक ऐसे कलाकार की, जिन्होंने मूक फिल्मों के युग से लेकर आधुनिक सिनेमा तक अपनी छाप छोड़ी। हम बात कर रहे हैं प्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक और अभिनेता पी. जयराज की। भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा प्रमुखता से लिया जाएगा।


पी. जयराज का जन्म 28 सितंबर 1909 को तेलंगाना के करीमनगर में हुआ। जब वे निजाम कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने 'शेक्सपियर' के नाटकों में भाग लेना शुरू किया। उनका परिवार काफी संपन्न था, उनके मामा की शादी सरोजनी नायडू से हुई थी और उनके पिता एक उच्च सरकारी पद पर थे।


जयराज के पड़ोसी पहले से फिल्म उद्योग में थे, जिन्होंने उन्हें इस क्षेत्र में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने दादा साहेब फाल्के के साथ मूक फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की। जयराज ने लगभग 11 साइलेंट फिल्मों में अभिनय किया और फिल्म निर्माण के हर पहलू में रुचि दिखाई।


उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में काम करना शुरू किया और 'प्रतिभा' उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी। 1929 में 'जगमगाती जवानी' से उन्हें बतौर अभिनेता पहला ब्रेक मिला। उनकी पहली बोलती फिल्म 'शिकारी' थी, जिसमें उन्होंने एक बौद्ध भिक्षु का किरदार निभाया।


अपने करियर में जयराज ने लगभग 300 फिल्मों में काम किया, जिनमें से 160 में उन्होंने नायक की भूमिका निभाई। वे तेलुगु भाषी थे, लेकिन हिंदी, गुजराती और मराठी फिल्मों में भी काम किया। 'बादबान', 'हातिम ताई', 'परदेसी' और 'रजिया सुल्तान' जैसी कई चर्चित फिल्मों में उनकी अदाकारी को सराहा गया।


1950 और 60 के दशक में जयराज ने कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए। उन्होंने अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप जैसे ऐतिहासिक नायकों को जीवंत किया। उनकी आखिरी फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में आई।


एक निर्माता के रूप में, उन्होंने 1951 में 'सागर' का निर्माण किया, जो लॉर्ड टेनीसन की कहानी पर आधारित थी। हालांकि, इस फिल्म ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे उन्हें फिर से अभिनय करना पड़ा।


लगभग 70 वर्षों तक फिल्म उद्योग में सक्रिय रहने के लिए उनका नाम 'गिनीज बुक' में दर्ज है। 1980 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।