क्या आप जानते हैं 'नया दौर' की कहानी को पहले क्यों किया गया था खारिज? जानें बीआर चोपड़ा की अनसुनी दास्तान!
बीआर चोपड़ा का अद्वितीय योगदान
मुंबई, 21 अप्रैल। हिंदी सिनेमा के महान फिल्म निर्माताओं में बीआर चोपड़ा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनके द्वारा बनाई गई कई फिल्में आज भी दर्शकों के दिलों में बसी हुई हैं। इनमें से एक, 1957 में रिलीज हुई 'नया दौर', के बारे में एक दिलचस्प कहानी है जो आज भी चर्चा का विषय है। यह वही फिल्म है, जिसे शुरू में कई प्रमुख फिल्म निर्देशकों ने अस्वीकार कर दिया था, जिनमें प्रसिद्ध महबूब खान भी शामिल थे।
सामाजिक मुद्दों पर आधारित कहानियाँ
बीआर चोपड़ा का सिनेमा में योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था। उन्होंने गंभीर विषयों पर आधारित कहानियों को दर्शकों के सामने रखा। उन्हें 1998 में दादा साहब फाल्के अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। चोपड़ा को एक ऐसा फिल्मकार माना जाता था, जो अपने आप में एक संस्था और सिनेमा का प्रतीक थे। उनकी जयंती 22 अप्रैल को मनाई जाती है।
नया दौर की कहानी का संघर्ष
चोपड़ा ने एक बार बताया था कि 'नया दौर' की कहानी उनके मित्र और लेखक एफ.ए. मिर्जा ने सुनाई थी। यह कहानी इंसान और मशीनों के बीच संघर्ष पर आधारित थी, जिसमें एक तांगा चलाने वाले की जिंदगी को केंद्र में रखा गया था। उस समय यह विषय काफी अनोखा और जोखिम भरा माना जाता था।
पहले अस्वीकृत, फिर सफल
दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी को पहले कई प्रमुख फिल्म निर्माताओं को सुनाया गया, लेकिन सभी ने इसे खारिज कर दिया। कुछ ने इसे 'डॉक्यूमेंट्री' जैसा बताया, जबकि अन्य ने इसे 'बकवास' कहकर नकार दिया। यहां तक कि महबूब खान ने भी इसे 'तांगे वाले की कहानी' कहकर नजरअंदाज कर दिया।
फिर भी, बीआर चोपड़ा ने इस कहानी में संभावनाएं देखीं और तय किया कि वह इस पर फिल्म बनाएंगे। उन्होंने इसे गांवों और खुले स्थानों पर शूट करने का निर्णय लिया ताकि कहानी की वास्तविकता दर्शकों तक पहुंच सके।
महबूब खान का चेतावनी
फिल्म के निर्माण के दौरान, महबूब खान खुद बीआर चोपड़ा के घर आए और उन्हें चेतावनी दी कि इस फिल्म को न बनाएं, क्योंकि इससे उन्हें नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा, 'तुम इस फिल्म से खत्म हो जाओगे।' लेकिन चोपड़ा ने अपने फैसले पर अडिग रहते हुए फिल्म को रिलीज करने का निर्णय लिया।
फिल्म की सफलता का जश्न
फिल्म रिलीज होने के बाद, 'नया दौर' ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चली। इसकी कहानी और संदेश ने दर्शकों का दिल जीत लिया। जब फिल्म की सिल्वर जुबली मनाई जा रही थी, तब महबूब खान ने चोपड़ा को फोन किया और कहा, 'मुख्य अतिथि के तौर पर किसे बुला रहे हो?' उन्होंने खुद को मुख्य अतिथि के रूप में आने की पेशकश की।
इस अवसर पर, उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्हें यह कहानी पसंद नहीं थी, लेकिन बीआर चोपड़ा की हिम्मत और विश्वास की जीत हुई। महबूब खान ने कहा कि यह फिल्म उनकी उम्मीदों के विपरीत बेहद सफल रही और इसका श्रेय चोपड़ा के साहस और दृढ़ निश्चय को जाता है।