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क्या आप जानते हैं 'जुबली कुमार' राजेंद्र कुमार की अनकही कहानी?

राजेंद्र कुमार, जिन्हें 'जुबली कुमार' के नाम से जाना जाता है, हिंदी सिनेमा के एक अद्वितीय सितारे थे। उनका जन्म 1927 में सियालकोट में हुआ और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1950 के दशक में की। 'मदर इंडिया' जैसी फिल्मों से पहचान बनाने वाले राजेंद्र कुमार ने 1960 के दशक में कई सफल फिल्में दीं। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 'पद्म श्री' से भी सम्मानित किया गया। 12 जुलाई 1999 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी फिल्में आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित हैं।
 

राजेंद्र कुमार: हिंदी सिनेमा के एक अद्वितीय सितारे


नई दिल्ली, 11 जुलाई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी अदाकारी और व्यक्तित्व से दर्शकों के दिलों में एक विशेष स्थान बना लिया। उनमें से एक थे राजेंद्र कुमार, जिन्हें सिनेमा की दुनिया में 'जुबली कुमार' के नाम से जाना जाता था। 12 जुलाई 1999 को उनके निधन ने हिंदी सिनेमा के सुनहरे युग का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त कर दिया।


राजेंद्र कुमार का जन्म 20 जुलाई 1927 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आया और मुंबई में उन्होंने फिल्म उद्योग में अपने करियर की शुरुआत करने का निर्णय लिया। उन्होंने पहले एच. एस. रवैल के साथ सहायक के रूप में काम किया, जिससे उन्हें फिल्म निर्माण की बारीकियों का ज्ञान मिला।


उनका अभिनय करियर 1950 के दशक में शुरू हुआ, और उन्होंने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई। फिल्म 'मदर इंडिया' (1957) में उनके प्रदर्शन ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कई सफल फिल्मों में काम किया, जिससे वे हिंदी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में शामिल हो गए।


1960 का दशक उनके करियर का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस दौरान उनकी कई फिल्में सफल रहीं और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलीं, जिसके कारण उन्हें 'जुबली कुमार' का उपनाम मिला। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'मेरे महबूब', 'संगम', 'दिल एक मंदिर', 'आरजू', 'सूरज', 'आई मिलन की बेला' और 'धूल का फूल' शामिल हैं।


राजेंद्र कुमार की विशेषता उनकी भावनात्मक भूमिकाएं थीं। वे प्रेम, त्याग और पारिवारिक जिम्मेदारियों से जुड़े किरदारों को प्रभावशाली तरीके से निभाते थे। उनकी स्क्रीन पर उपस्थिति में एक सहजता थी, जिससे दर्शक उनके किरदारों से जुड़ जाते थे।


एक अभिनेता के रूप में उनकी पहचान के अलावा, उन्होंने फिल्म निर्माण में भी योगदान दिया। उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव के करियर को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म उद्योग में उन्हें उनके सौम्य व्यवहार और मजबूत रिश्तों के लिए भी जाना जाता था।


भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया। चार दशकों से अधिक के करियर में उन्होंने 80 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया और हिंदी सिनेमा को कई यादगार किरदार दिए।


12 जुलाई 1999 को मुंबई में उनका निधन हुआ। उनकी पहचान केवल सफल फिल्मों से नहीं, बल्कि दर्शकों के साथ बने भावनात्मक रिश्ते से भी थी। आज भी राजेंद्र कुमार की फिल्में हिंदी सिनेमा के क्लासिक दौर की याद दिलाती हैं, और उनकी रोमांटिक छवि उन्हें सदाबहार सितारों की कतार में बनाए रखती है।