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क्या आज भी समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं को स्वीकार करना मुश्किल है? सबा आजाद का खुलासा

अभिनेत्री सबा आजाद ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं को स्वीकार करना अभी भी एक चुनौती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। सबा ने यह भी बताया कि कैसे पितृसत्तात्मक सोच महिलाओं के संघर्ष को और बढ़ा देती है। उनके विचारों में बदलाव की आवश्यकता है, और मजबूत महिलाओं से सीखने की प्रेरणा भी है। जानें सबा के इस महत्वपूर्ण बयान के बारे में और क्या है उनके विचार।
 

महिलाओं की महत्वाकांक्षा पर सबा आजाद की राय

मुंबई, 17 मई। अभिनेत्री सबा आजाद ने हाल ही में कहा कि आज भी समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं को पूरी तरह से स्वीकार करना एक चुनौती है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि जबकि समानता और प्रगति की बातें की जाती हैं, वास्तविकता में महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

एक विशेष बातचीत में, सबा ने बताया कि हमारा सामाजिक ढांचा लंबे समय से पुरुषों की सफलता को प्राथमिकता देता आया है। इस कारण, महिलाओं को अपनी पहचान स्थापित करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या समाज आज भी महत्वाकांक्षी महिलाओं को आसानी से स्वीकार नहीं करता, तो सबा ने कहा कि हम एक पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं। महिलाओं के बारे में जल्दी राय बना ली जाती है और उन्हें हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ता है।

उन्होंने कहा, "महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए अक्सर दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। हम एक पितृसत्तात्मक समाज में हैं, जहां महिलाओं के बारे में राय बनाना बहुत आसान है। हमारे देश के कई हिस्सों में, महिलाओं को स्वतंत्रता से काम करने या अपने निर्णय खुद लेने की अनुमति नहीं है। शहरों में यह सच्चाई शायद कम दिखाई दे, लेकिन यह मौजूद है। इसलिए महिलाओं को हर जगह खुद को साबित करना पड़ता है - न केवल कार्यस्थल पर, बल्कि घर पर भी। यदि वे काम करती हैं, तो उन पर उंगलियां उठती हैं, और यदि वे काम नहीं करतीं, तो भी उन पर उंगलियां उठती हैं।

सबा ने आगे कहा कि महिलाओं से उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं, जिससे उनका संघर्ष और भी कठिन हो जाता है।

पुरुषों के अहंकार पर सवाल उठाने पर, उन्होंने कहा कि समाज अब भी पुरुष प्रधान सोच के तहत चलता है। कई पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि वे महिलाओं से बेहतर हैं। जब वे मजबूत और आत्मनिर्भर महिलाओं को देखते हैं, तो उनकी सोच को चुनौती मिलती है और उनका अहंकार आहत हो सकता है।

हालांकि, सबा का मानना है कि बदलाव सीखने से आता है। उन्होंने कहा कि सच को स्वीकार करने से ही समाज आगे बढ़ सकता है। उनके अनुसार, मजबूत महिलाओं से हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता है।

उन्होंने कहा, "जब भी मैं किसी मजबूत महिला से मिलती हूं, तो मेरी पहली सोच यही होती है कि मैं उससे कुछ सीखूं। महिलाएं एक साथ कई काम बहुत आसानी से कर लेती हैं और उनमें एक ऐसी भावनात्मक मजबूती होती है, जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ है।"

--समाचार स्रोत

एएस/