कौन हैं मजरूह सुल्तानपुरी? जानें इस महान गीतकार की प्रेरणादायक कहानी
मजरूह सुल्तानपुरी का अद्भुत सफर
मुंबई, 23 मई। भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग के मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी आज भी अपने गीतों के माध्यम से लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनका सफर एक साधारण शायर से शुरू होकर भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित गीतकारों में से एक बनने तक का है। यह यात्रा एक मुशायरे से आरंभ हुई, जहां उनकी शायरी ने फिल्म निर्माता एआर कारदार को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाने का निर्णय लिया।
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद में हुआ। उनका असली नाम असरार उल हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और चाहते थे कि उनका बेटा पारंपरिक शिक्षा प्राप्त करे। इस कारण उन्हें मदरसे में दाखिला दिलवाया गया, जहां उन्होंने अरबी और फारसी की पढ़ाई की और आलिम की उपाधि प्राप्त की। बाद में, लखनऊ के तक्मील उल तिब्ब कॉलेज से यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और हकीम बने। लेकिन उनकी शायरी की प्रवृत्ति उन्हें चिकित्सा से ज्यादा शायरी की ओर खींच लाई।
सुल्तानपुरी में रहते हुए उन्होंने गज़लें लिखना शुरू किया और मुशायरों में भाग लेने लगे। इस दौरान वे प्रसिद्ध शायर जिगर मुरादाबादी के संपर्क में भी रहे। हालांकि, मुशायरे ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। 1945 में मजरूह सुल्तानपुरी बॉम्बे आए और साबू सिद्दीकी इंस्टीट्यूट में एक मुशायरे में अपनी शायरी प्रस्तुत की। उनकी गहरी और प्रभावशाली शायरी ने वहां उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उस मुशायरे में मौजूद फिल्म निर्माता एआर कारदार भी थे, जिन्होंने उनकी शायरी से प्रभावित होकर उन्हें आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
कारदार ने जिगर मुरादाबादी के माध्यम से मजरूह से संपर्क किया और 1946 में उन्हें संगीतकार नौशाद से मिलवाया। इस मुलाकात के बाद मजरूह को फिल्म 'शाहजहां' के लिए गीत लिखने का अवसर मिला, जिसमें केएल सहगल मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म के साथ ही मजरूह सुल्तानपुरी ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा।
1950 से 1960 के दशक तक मजरूह सुल्तानपुरी ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने नौशाद, मदन मोहन, एसडी बर्मन, रोशन, ओपी नैयर, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन, राजेश रोशन, आनंद-मिलिंद, जतिन-ललित और एआर रहमान जैसे कई प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। उनके द्वारा लिखे गए गीत जैसे 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे', 'दिल देके देखो', 'रहे न रहे हम', 'माना जनाब ने पुकारा नहीं', 'तेरी बिंदिया रे' और 'लेकर हम दीवाना दिल' आज भी लोगों की जुबां पर हैं।
1965 में फिल्म 'दोस्ती' के गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1993 में उन्हें दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड भी मिला। मजरूह सुल्तानपुरी वामपंथी विचारधारा के समर्थक थे और 1949 में बलराज साहनी के साथ कुछ समय जेल में भी बिताया। वे कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते थे।
24 मई 2000 को निमोनिया के कारण उनका निधन हो गया।