कौन थीं टुन टुन? जानें हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन की प्रेरणादायक कहानी
टुन टुन: एक अद्वितीय कॉमेडियन की यात्रा
मुंबई, 10 जुलाई। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मशहूर कॉमेडियन टुन टुन, जिनका असली नाम उमा देवी खत्री था, अपने अद्भुत चेहरे के भाव, बोलने के अंदाज और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग के लिए जानी जाती थीं। हालांकि, उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। वह एक गायिका बनने का सपना लेकर फिल्म इंडस्ट्री में आईं, लेकिन बाद में उन्होंने कॉमेडी में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया, जिससे उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन का खिताब मिला। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत से पहले यह इच्छा जताई थी कि उनकी पहली फिल्म उनके पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार के साथ हो।
टुन टुन का जन्म 11 जुलाई 1923 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ। उनका बचपन कठिनाइयों से भरा था। जब वह छोटी थीं, उनके माता-पिता की हत्या एक जमीन विवाद के चलते हो गई। इसके बाद उनके भाई की भी मृत्यु हो गई। माता-पिता और भाई को खोने के बाद, टुन टुन का बचपन रिश्तेदारों के सहारे बीता, लेकिन वहां भी उन्हें प्यार और सुरक्षा नहीं मिली।
बचपन से ही टुन टुन को संगीत का बहुत शौक था। उन्होंने औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन रेडियो पर गाने सुनकर अभ्यास किया। उनकी आवाज में एक खास मिठास थी और वह हमेशा चाहती थीं कि मुंबई जाकर गायिका बनें। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने कई संघर्ष किए।
जब टुन टुन मुंबई पहुंचीं, तो उनकी मुलाकात प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद से हुई। कहा जाता है कि उन्होंने नौशाद से गाने का अवसर मांगा, जिसके बाद उन्हें 1946 की फिल्म 'वामिक अजरा' में गाने का मौका मिला। हालांकि, उनकी असली पहचान 1947 में आई फिल्म 'दर्द' के गाने 'अफसाना लिख रही हूं' से बनी, जो बेहद लोकप्रिय हुआ।
सिंगर के रूप में सफलता मिलने के बाद, फिल्म संगीत में बदलाव आने लगा और नई आवाजों के आने से टुन टुन को पहले जैसी पहचान नहीं मिल रही थी। इसी दौरान, नौशाद ने उनकी अभिनय प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अभिनय में हाथ आजमाने की सलाह दी। टुन टुन ने इसके लिए एक शर्त रखी कि उनकी पहली फिल्म दिलीप कुमार के साथ हो।
नौशाद की दिलीप कुमार से दोस्ती के चलते, टुन टुन को 1950 में फिल्म 'बाबुल' में दिलीप कुमार और नरगिस के साथ काम करने का मौका मिला। इसी फिल्म के दौरान उनका नाम उमा देवी से बदलकर टुन टुन रखा गया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया।
'बाबुल' के बाद, टुन टुन ने कॉमेडी किरदारों में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी मासूमियत और संवाद बोलने का तरीका दर्शकों को बहुत पसंद आया। उन्होंने गुरु दत्त की फिल्मों 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55' और 'प्यासा' जैसी कई यादगार फिल्मों में काम किया।
अपने लगभग पांच दशक लंबे करियर में, टुन टुन ने लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया और उस समय के कई बड़े कलाकारों के साथ स्क्रीन साझा किया। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि उनके लिए खासतौर पर हास्य किरदार लिखे जाने लगे।
पति अख्तर अब्बास काजी के निधन के बाद, टुन टुन ने धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली। उनकी आखिरी हिंदी फिल्म 1990 में आई 'कसम धंधे की' थी। लंबे समय तक बीमारी से जूझने के बाद, 23 नवंबर 2003 को मुंबई में 80 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।