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कैसे एक वकील बना मलयालम सिनेमा का 'मेगास्टार' ममूटी? जानें उनकी अनोखी कहानी!

ममूटी, जो मलयालम सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं, ने अपने करियर की शुरुआत वकालत से की थी। 70 के पार भी, उनका जुनून और काम करने की इच्छा कम नहीं हुई है। जानें उनकी अनोखी यात्रा और कैसे उन्होंने सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।
 

ममूटी: एक अद्वितीय सफर


मुंबई, 6 सितंबर। जब मलयालम सिनेमा के बड़े नामों की चर्चा होती है, तो ममूटी का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने अपने पांच दशकों के करियर में सैकड़ों फिल्मों में काम किया है और एक अलग पहचान बनाई है। ममूटी का सफर फिल्मों में आने से पहले वकालत से शुरू हुआ था, लेकिन किस्मत ने उन्हें कैमरे के सामने ला खड़ा किया और वह धीरे-धीरे मलयालम सिनेमा के मेगास्टार बन गए।


ममूटी का असली नाम मुहम्मद कुट्टी पनापरम्बिल इस्माइल है, और उनका जन्म 7 सितंबर 1951 को हुआ था। केरल में पले-बढ़े ममूटी ने एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री प्राप्त की और बाद में वकालत की। हालांकि, उनका अभिनय का सपना हमेशा उनके साथ था, और पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में काम करना शुरू किया।


1971 में, ममूटी ने 'अनुभवंगल पालिचाकल' में एक बाल कलाकार के रूप में अपनी पहली फिल्म की। भले ही उनकी भूमिका छोटी थी, लेकिन इससे उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई। इसके बाद, उन्होंने 1980 में 'विल्क्कनुंडु स्वप्नंगल' से पहचान बनाई और धीरे-धीरे मुख्य भूमिकाओं की ओर बढ़े।


1980 का दशक ममूटी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। 'अहिंसा', 'संध्याक्कु विरिंजा पूवु', 'अथिरात्रम', 'यात्रा', 'निराकूट्टू' और 'न्यू दिल्ली' जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों के बीच एक मजबूत पहचान दिलाई।


ममूटी ने मलयालम सिनेमा में अपनी जगह इतनी मजबूत कर ली कि वह इंडस्ट्री के बड़े सितारों में गिने जाने लगे। 'ओरु वडक्कन वीरगाथा', 'मथिलुकल', 'विदेयन', 'पोंथन माडा' और 'डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय की आलोचकों ने सराहना की। विशेष रूप से, 'डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर' में उनका प्रदर्शन उनके करियर के सबसे यादगार क्षणों में से एक रहा।


ममूटी ने केवल मलयालम फिल्मों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया। उनकी बहुभाषी प्रतिभा ने उन्हें क्षेत्रीय सीमाओं से परे पहुंचाया। उन्होंने अपने करियर में 400 से अधिक फिल्मों में काम किया है और आज भी नए विषयों और कहानियों को चुनने में पीछे नहीं हटते।


उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं, और उन्हें केरल राज्य फिल्म पुरस्कारों और फिल्मफेयर दक्षिण पुरस्कारों से भी कई बार सम्मानित किया गया है। भारत सरकार ने उन्हें 1998 में सिनेमा में उनके योगदान के लिए पद्म श्री से नवाजा।


70 की उम्र पार करने के बाद भी ममूटी का काम करने का जुनून कम नहीं हुआ है। वह आज भी नई फिल्मों और चुनौतीपूर्ण किरदारों का हिस्सा बन रहे हैं।