ऋषिकेश मुखर्जी: भारतीय सिनेमा के मास्टरमाइंड की जयंती पर उनकी यादगार फिल्में
भारतीय सिनेमा के दिग्गज ऋषिकेश मुखर्जी
मुंबई, 29 सितंबर। भारतीय फिल्म उद्योग के प्रसिद्ध निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने अपने कार्यों से दर्शकों के दिलों में एक विशेष स्थान बनाया। उनकी फिल्मों में मध्यवर्गीय जीवन की जटिलताएं, दांपत्य जीवन, गहरी मित्रता, कार्यस्थल की कहानियां और आम आदमी की समस्याएं बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत की गई हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि वे एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से हैं और इसी कारण से वे उस दुनिया को अच्छी तरह समझते थे। यही वजह है कि उनके सिनेमा में आम परिवारों की कहानियां बार-बार देखने को मिलती हैं।
ऋषिकेश मुखर्जी ने लगभग 50 फिल्मों का निर्देशन किया और 'आनंद', 'सत्यकाम', 'बावर्ची', 'अभिमान', 'चुपके चुपके', 'मिली' और 'गोल माल' जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई। 30 सितंबर को उनकी जयंती है, इस अवसर पर हम उनकी कुछ प्रमुख फिल्मों पर चर्चा करेंगे जो उनके करियर और हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुईं।
सत्यकाम: सत्य और ईमानदारी की कहानी
1969 की फिल्म 'सत्यकाम' में धर्मेंद्र ने सत्यप्रिय आचार्य का किरदार निभाया। यह कहानी एक ऐसे युवक की है जो हर हाल में सच और ईमानदारी से जीना चाहता है। लेकिन जैसे-जैसे वह दुनिया को देखता है, उसे एहसास होता है कि हर जगह उसके आदर्शों के अनुसार चीजें नहीं चलतीं। ऋषिकेश मुखर्जी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह इस कहानी से बहुत प्रभावित हुए थे और समाज में बढ़ती गलत चीजों पर गुस्सा महसूस करते थे। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म का सम्मान मिला।
आनंद: जीवन का जश्न
1971 में आई 'आनंद' में राजेश खन्ना ने आनंद सहगल और अमिताभ बच्चन ने डॉक्टर भास्कर का किरदार निभाया। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जिसे अपनी जिंदगी की सीमितता का पता है, लेकिन वह अपने बचे हुए समय को खुशी से जीना चाहता है। डॉक्टर भास्कर, जो जिंदगी और मौत को गंभीरता से लेते हैं, आनंद की दोस्ती से बदलते हैं। फिल्म के संवाद जैसे 'बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं' आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। इस फिल्म को भी राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म का सम्मान मिला।
बावर्ची: परिवार की अहमियत
1972 में आई 'बावर्ची' में राजेश खन्ना ने रघु का किरदार निभाया। वह एक ऐसे परिवार में बावर्ची बनकर आते हैं जहां लोग छोटी-छोटी बातों पर उलझते रहते हैं। रघु अपने अच्छे व्यवहार से परिवार का माहौल बदल देता है। इस फिल्म ने परिवार के साथ रहने की अहमियत को दर्शाया।
अभिमान: दांपत्य जीवन की जटिलताएं
1973 की 'अभिमान' में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने पति-पत्नी का किरदार निभाया। सुबीर एक सफल गायक है, जबकि उसकी पत्नी उमा भी बहुत अच्छी गाती है। जब उमा की लोकप्रियता बढ़ने लगती है, तो सुबीर के मन में जलन और अहंकार आ जाता है, जिससे उनके रिश्ते में तनाव उत्पन्न होता है।
मिली: उम्मीद और प्यार की कहानी
1975 में आई 'मिली' में जया बच्चन ने एक खुशमिजाज लड़की का किरदार निभाया, जो गंभीर बीमारी से जूझ रही है। वह अपने आसपास खुशियां बांटती है, जबकि उसकी अपनी जिंदगी मुश्किलों से भरी है। इस फिल्म ने बीमारी के साथ प्यार और उम्मीद को सरलता से दर्शाया।