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उस्ताद अल्ला रक्खा खां: तबला वादन के जादूगर की पुण्यतिथि पर एक श्रद्धांजलि

उस्ताद अल्ला रक्खा खां, भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान तबला वादक, की पुण्यतिथि पर हम उनकी अद्वितीय यात्रा को याद करते हैं। उनका जन्म 1919 में हुआ और उन्होंने अपनी कला से दुनिया भर में पहचान बनाई। उनके गुरु के कठोर प्रशिक्षण से लेकर पंडित रविशंकर के संगतकार बनने तक, उनकी मेहनत और समर्पण ने उन्हें एक अद्वितीय स्थान दिलाया। उनके निधन पर देश ने एक महान उस्ताद को खो दिया। इस लेख में उनकी जीवन यात्रा और संगीत के प्रति उनके योगदान को जानें।
 

उस्ताद अल्ला रक्खा खां का संगीत सफर


नई दिल्ली, 3 फरवरी। भारतीय शास्त्रीय संगीत के अद्वितीय तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा खां ने अपनी कला से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उनकी पुण्यतिथि पर, हम उनकी संगीत यात्रा को याद करते हैं।


अल्ला रक्खा का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू के घगवाल गांव में हुआ, जो लाहौर से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। जब वह अपने चाचा के पास गुरदासपुर में रह रहे थे, तब 12 साल की उम्र में उन्हें तबले की ध्वनि ने आकर्षित किया। उन्होंने पंजाब घराने के मियां कादर बख्श से तबला सीखा और पटियाला घराने के उस्ताद आशिक अली खान से राग विद्या की शिक्षा ली।


अपनी कला को निखारने के लिए उन्होंने कठिन परिश्रम किया और अनुशासन के साथ आगे बढ़े। एक बार उन्होंने बताया कि उनके गुरु उन्हें ठंड में भी कम कपड़े पहनकर रियाज करने के लिए कहते थे। उनका मानना था कि जब तक शरीर पसीने से तर न हो जाए, तब तक रियाज नहीं रोकनी चाहिए। वह 5 से 7 घंटे तक लगातार तबला बजाते थे, जो उनकी लगन का प्रतीक था।


अल्ला रक्खा ने अपने करियर की शुरुआत लाहौर में संगतकार के रूप में की। 1940 में वे अखिल भारतीय रेडियो से जुड़े और 1943 से 1948 तक कुछ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत भी दिया। 1960 के दशक में पंडित रविशंकर के संगतकार बनने के बाद उन्हें पहचान मिली। उनके साथ पश्चिमी देशों में प्रस्तुतियों ने तबला वादन को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया।


उनकी ताल की सटीकता और संवेदनशीलता ने दर्शकों का ध्यान खींचा। वे न केवल संगतकार के रूप में, बल्कि एकल कलाकार के रूप में भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के बीच की दूरी को कम किया और दोनों परंपराओं के कलाकारों के साथ प्रस्तुतियां दीं। उन्हें प्यार से 'अब्बाजी' कहा जाता था।


उस्ताद अल्ला रक्खा का निधन 3 फरवरी 2000 को हुआ। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि देश ने एक कुशल उस्ताद को खो दिया है, जिनकी कला ने पूरी दुनिया में धूम मचाई। तत्कालीन राष्ट्रपति केआर. नारायणन ने कहा कि उनके निधन से 'एक अद्वितीय स्पंदन थम गया है।'