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अमजद खान का गब्बर: शोले के डायलॉग्स और पिता की प्रेरणा

1970 के दशक में रिलीज हुई फिल्म 'शोले' ने अमजद खान को गब्बर के रूप में अमर बना दिया। इस लेख में जानें कि कैसे उनके पिता की सलाह और एक धोबी की प्रेरणा ने उनके करियर को बदल दिया। फिल्म के आइकॉनिक डायलॉग्स आज भी लोगों की जुबान पर हैं। पढ़ें पूरी कहानी और जानें गब्बर के पीछे की प्रेरणा।
 

शोले: एक कालजयी फिल्म

1970 के दशक में एक ऐसी फिल्म आई जिसने दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली। आज भी इस फिल्म के फैंस इसकी हर एक लाइन को याद करते हैं। 'शोले' में हर किरदार ने अपनी अदाकारी से फिल्म में जान डाल दी। गब्बर का किरदार निभाने वाले अमजद खान को उनके पिता जयंत ने एक बार सलाह दी थी, 'अगर तुम खास लोगों की नकल करोगे, तो पहचाने जाओगे। अगर नकल करनी है, तो आम लोगों की करो।'


अमजद खान का करियर

जब 'शोले' रिलीज हुई, तो यह एक बड़ी हिट साबित हुई। रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने अमजद खान को रातोंरात स्टार बना दिया। इस फिल्म ने उन्हें गब्बर के रूप में अमर कर दिया।


गब्बर के यादगार डायलॉग्स

"कितने आदमी थे?"


"जो डर गया, समझो मर गया।"


"बहुत याराना लगता है।"


"ये हाथ हमको दे दे ठाकुर।"


"तेरा क्या होगा कालिया?"


"अरे ओ सांभा।"


"जब तक तेरे पैर चलेंगे, उसकी सांस चलेगी। तेरे पैर रुक, तो बंदूक चलेगी।"


पिता की सलाह का असर

शोले के डायलॉग्स आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इनमें से एक डायलॉग वास्तव में अमजद के एक धोबी से प्रेरित था, जैसा कि उनकी पत्नी ने बताया।


धोबी से प्रेरित डायलॉग

रोशमिला भट्टाचार्य की किताब 'Bollywood's Iconic Villains Bad Men' के अनुसार, अमजद की पत्नी शहला ने बताया कि उनके ससुर ने अमजद को सलाह दी थी कि आम लोगों से प्रेरणा लेना बेहतर है। उन्होंने कहा, "हमारे पास एक धोबी था जो अपनी पत्नी को पुकारता था, 'अरे ओ शांति', और इसी से 'अरे ओ सांभा' डायलॉग निकला।" शोले के गब्बर के डायलॉग्स आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।