रास बिहारी बोस: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय नायक की कहानी
रास बिहारी बोस का परिचय
Indian Independence Movement(Photo-Social Media)
Indian Independence Movementरास बिहारी बोस: एक प्रमुख क्रांतिकारी नेता और राष्ट्रवादी विचारक, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गदर आंदोलन और आजाद हिंद फौज के गठन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जन्म 25 मई 1886 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के सुबालदह गांव में हुआ। उनके पिता का नाम विनोद बिहारी बोस था, और उनकी माता का निधन जब वे केवल तीन वर्ष के थे। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी मामी ने उठाई।
शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
रास बिहारी बोस ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चंदननगर में प्राप्त की और उच्च शिक्षा डुप्लेक्स कॉलेज, चंदननगर से हासिल की। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना थी, और वे स्वतंत्रता का सपना देखा करते थे। उनके शिक्षक चारुचंद्र ने उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना को और प्रबल किया।
क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत
शिक्षा पूरी करने के बाद, रास बिहारी बोस ने देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में हेड क्लर्क के रूप में कार्य करना शुरू किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात अमरेंद्र चटर्जी से हुई, जो जतिन मुखर्जी के नेतृत्व वाले ‘युगांतर’ क्रांतिकारी संगठन से जुड़े थे। इसके बाद, वे बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और अरविंद घोष के शिष्य जतींद्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालंब स्वामी से भी जुड़े।
लार्ड हार्डिंग पर बम हमला
23 दिसंबर 1912 को दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग की शोभायात्रा के दौरान, रास बिहारी बोस ने योजना बनाई कि बम फेंककर वायसराय की हत्या की जाए। योजना के अनुसार, चांदनी चौक से गुजर रही शोभायात्रा पर एक मकान की दूसरी मंजिल से बम फेंका गया। हालांकि, वायसराय केवल घायल हुए। घटना के बाद, रास बिहारी बोस ने देहरादून में एक सभा आयोजित कर हमले की निंदा की।
जतिन मुखर्जी से मुलाकात
1913 में बंगाल में आई बाढ़ के दौरान राहत कार्य करते समय उनकी मुलाकात जतिन मुखर्जी से हुई। इस मुलाकात ने रास बिहारी बोस को स्वतंत्रता संग्राम के लिए नया उत्साह दिया और वे और अधिक सक्रियता से क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट गए।
गदर आंदोलन और सशस्त्र क्रांति
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, रास बिहारी बोस ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए गदर आंदोलन की योजना बनाई। फरवरी 1915 में, उन्होंने कई क्रांतिकारियों को सेना में शामिल कराने का प्रयास किया। वाराणसी उनका प्रमुख केंद्र था, जहां से वे गुप्त रूप से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करते थे।
जापान प्रवास
सशस्त्र क्रांति की योजना विफल होने के बाद, ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां उनके पीछे पड़ गईं। जून 1915 में, वे अपना नाम बदलकर जापान पहुंचे। वहां उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता शुरू की और ‘न्यू एशिया’ नामक समाचार पत्र निकाला।
विवाह और आजाद हिंद फौज
1916 में, रास बिहारी बोस ने पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कुत्सुको की पुत्री से विवाह किया। 1923 में, उन्हें जापान की नागरिकता प्राप्त हुई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए जापान का सहयोग लेने का निर्णय लिया।
निधन और सम्मान
विदेशों में रहकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते-करते रास बिहारी बोस का स्वास्थ्य कमजोर हो गया। 21 जनवरी 1945 को उनका निधन हो गया। उनके निधन से पूर्व, जापान सरकार ने उन्हें “ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन” सम्मान से सम्मानित किया।